इष्ट/अनिष्ट स्थायी नहीं रहते।
माँ बचपन में इष्ट, शादी के बाद पत्नी फिर बच्चे, वृद्धावस्था में भगवान।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

तारीफ़ नहीं,
अपनी ओर देख,
चक्कर नहीं।

(जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

गाड़ी जब रिवर्स में जाती है तब गति तो कम पर सावधानी ज्यादा रखनी पड़ती है।
ऐसे ही बाहर से अंदर की यात्रा करते समय गति तो कम पर सावधानी बहुत रखनी चाहिए।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

धर्म से ज्यादा (जल्दी) कल्याण धर्मात्मा से।
नमोस्तु धर्म को, आशीर्वाद धर्मात्मा से।
पूजा धर्म की, फल धर्मात्मा बनने पर।
3 अनुयोगों (75% धर्मशास्त्र) में धर्मात्मा की चर्चा, 1 अनुयोग (द्रव्यानुयोग) में धर्म की।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर चीता होता है। फिर भी वह 10 बार शिकार के पीछे दौड़ता है तो एक बार शिकार को पकड़ पाता है।
कारण?
भूख से ज्यादा जान महत्वपूर्ण होती है।

चिंतन

हमारे पुण्य कर्मों/ दुआओं का प्रभाव हमारे प्रियजनों पर होता है या नहीं ?
उनके दुःख से आप दुःखी होते हैं तो आपके पुण्य से वे सुखी न होंगे ?
हाँ ! उनके पापोदय की अधिकता में आपका पुण्य/ दुआएँ प्रभावशाली नहीं होंगी।
ऐसा ही बद-दुआ में लगा लेना।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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