Category: अगला-कदम
गुरु
गुरु दर्शन कठिन (चक्षु इन्द्रिय से) गुरु आर्शीवाद दुर्लभ (कर्ण इन्द्रिय से) गुरु वचन दुर्लभ से दुर्लभ (मन, कर्ण इन्द्रिय से) मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
मतिज्ञान
क्या मतिज्ञान अवग्रह से धारणा तक क्रम से ही जायेगा ? निधि-मुम्बई क्रम से भी जायेगा, अवग्रह पर ही रुक सकता है या सीधा अवग्रह
शरीर और आत्मा
बचपन, युवावस्था, वृद्धावस्था में शरीर अलग-अलग पर आत्मा एक। यदि वृद्धावस्था को स्वीकार लिया तो जीवन में निराशा, यदि अपने को आत्मा मान लिया तो
राग
राग को तो बुरा कहा, फिर धर्मानुराग अच्छा कैसे ? धर्म को बहुमान देने/ अपने में धारण करने के लिये धर्म से और धर्म धारण
Start
Nobody can go back and start a new beginning, but anyone can start today and make a new ending. (Mayank Pandya)
उदयाभावी क्षय
उदयाभावी क्षय… उदय का अभाव रूप क्षय। जो कषाय उदय में आने के एक समय पहले ही अन्य कषाय रूप परिवर्तित होकर उदय मे आये।
कर्म का बँटवारा
कर्म प्रकृतियों का एक भाग सर्वघाति को मिलता है तथा अनंत बहुभाग देशघाति को मिलता है । (तभी क्षयोपशम सम्भव होगा…कमला बाई जी) कर्मकांड़ गाथा–
सिद्धों में भोगादि
भोग → प्रति समय आत्मा में ज्ञान/ चैतन्य भाव। उपभोग → वही रस बार-बार समयों में भोगना। जैसे अनार रस पहले घूँट में भोग, बार-बार
सिद्ध
सिद्ध में न मार्गणा ना ही गुणस्थान, उनके न संयम होता है ना ही असंयम, क्योंकि वे साधना से रहित हो गये हैं। मुनि श्री
भव्यत्व
वैसे तो भव्यत्व अनादि-सांत है पर एक आचार्य ने सादि-सांत भी कहा है → सम्यग्दर्शन होने पर ही भव्यत्व माना है। आर्यिका श्री विज्ञानमति जी
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