Category: डायरी
कषाय
क्रोध प्रीति को नष्ट करता है। मान, विनय को। माया, मैत्री, लोभ, सर्व विनाशक है। क्षुल्लक श्री जिनेंद्रवर्णी जी (शांतिपथ प्रदर्शक)
अनर्थ फल
प्रश्न: पाप का अनर्थफल क्या है ? उत्तर: मन का अस्तव्यस्त/अशांत होना। -आचार्य श्री अमोघवर्ष कृत प्रश्नोत्तर-रत्नमाला (गाथा सं 15) यह पाप का प्रत्यक्ष/तुरंत मिलने
समाधिमरण
समाधिमरण के समय संबोधन कम करना चाहिए। शरीर शिथिल हो रहा होता है, अधिक संबोधन अतिभारारोपण हो जाएगा और उसके भाव ख़राब हो सकते हैं।
बच्चों को नियम
आज पलायन बहुत हो रहा है। गांव से शहर, शहर से मेट्रो और मेट्रो से विदेश जाने होड़ लगी हुई है। बच्चों को बाहर भेजने
ग्रहण/ त्याग
इंद्रियों आदि के कार्य… सिर्फ़ ग्रहण करते हैं… कान, आँख, नाक, रसना, स्पर्श इंद्रियां, माथा(आशीर्वाद), पैर (मंजिल) सिर्फ़ त्याग करते हैं… फेफड़े (गंदी हवा) ग्रहण
तीन काल
भूतकाल Experience, वर्तमान Experiment(Based on Experience) , भविष्य Expectation. वर्तमान अपना, अपनाते नहीं, Feel करें; भूत और भविष्य Fail करें। मुनि श्री सौम्य सागर जी
Thinking
Positive Thinking…जैसे आशीर्वाद मिलेगा ही। सोच को बदलते रहना चाहिए।अस्थाई। अपेक्षा सहित। Real Thinking…….जैसे गुरुओं/ बड़ों को नमस्कार हमेशा करूंगा, आशीर्वाद मिल भी सकता है
मुक्ति
मुक्ति के दो प्रकार – रस्सियों (कर्मों की) को तोड़कर भागना। इसके लिए बलशाली होना पड़ेगा। जितने कर्म बंध रहे हैं, उससे ज्यादा तोड़ें। नयी
Recent Comments