Category: अगला-कदम
उपयोग / लब्धि
उपयोग में एक समय में एक ही ज्ञान होता है। अन्य ज्ञान कर्मों के क्षयोपशम से लब्धि रूप रहते हैं। केवलज्ञान हमेशा उपयोग रूप ही
समय
एक-समय, निश्चय काल की अपेक्षा –> द्रव्य, व्यवहार काल की अपेक्षा –> पर्याय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान)
अयोग केवली / नोकर्माहार
अयोग केवली के नोकर्माहार नहीं रहता तो शरीर कैसे चलता है ? आचार्य श्री विद्यासागर जी – पाप त्याग के बाद भी अल्प रहे संसार।
सर्वोत्तम
जब बुद्धि को विश्राम देते हैं तो सर्वोत्तम निकलता है क्योंकि आत्मज्ञान Takeover कर लेता है। चाहे संगीत हो या परमार्थ। भगवान जब श्रेणी माढ़ते
अचल-प्रदेश
धर्म, अधर्म और आकाश के भी अचल-प्रदेश होते हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड-576 – 28 जून)
क्षयोपशम
कर्मों के एकदेश क्षय या उदयाभावी क्षय तथा एकदेश उपशम को क्षयोपशम कहते हैं। क्षुल्लक श्री जैनेंद्र वर्णी जी (कर्म सिद्धांत)
अर्पिता नर्पित सिद्धे
अस्तित्व धर्म अस्ति को बताता है। नास्तित्व धर्म अन्य द्रव्यों से पृथक करता है पर रूपी नहीं होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र
विचय
अपाय/ उपाय विचय चौथे गुणस्थान में नहीं होता। जो खुद दुखों से बचने का उपाय नहीं कर रहा, वह दूसरों को बचाने का क्या/ क्यों
कार्मण शरीर
कार्मण शरीर की उत्कृष्ट स्थिति (एक कर्म की अपेक्षा) 70 कोड़ाकोड़ी सागर होती है। सब कर्मों की अपेक्षा अनादि-अनंत या सांत। मुनि श्री सौम्य सागर
क्षायिक लाभ
अनंत गुणों का अनंत काल के लिये लाभ को क्षायिक लाभ कहते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 2/5)
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