Category: अगला-कदम
सूक्ष्म / साधारण
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… सूक्ष्म और बादर, जीव के विशेषण हैं, प्रत्येक और साधारण, शरीर के। मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड
सप्रतिष्ठित / अप्रतिष्ठित
आचार्य श्री विद्यासागर जी उदाहरण देकर बताते थे… आम का छिलका अप्रतिष्ठित, गूदा सप्रतिष्ठित, गुठली अप्रतिष्ठित, मींग सप्रतिष्ठित। मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड
सप्त धातु
वैक्रियिक शरीर में सप्तधातु नहीं होती है। पर नारकियों के शरीर में अशुभतर होती है, क्योंकि उनको शारीरिक रोग/ कष्ट होते हैं, पहले से सातवें
भवनत्रिक में लेश्या
मान्यता है कि भवनत्रिक में पीत तथा तीन अशुभ लेश्या होती हैं और अशुभ लेश्या अपर्याप्तक अवस्था में ही होती हैं। तत्तवार्थसूत्र में ऐसा कोई
निगोदिया / साधारण
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे कि साधारण जीव के आश्रित अनंत निगोदिया रहते हैं। पर निगोदिया जीव को साधारण नहीं कहते, यह एक अलग
मनुष्य
मनुष्य पर्याय में पर्याप्तकों की संख्या अधिक होती है, अपर्याप्तकों से। कारण ! मनुष्य पर्याय में पुण्यात्मा जन्म लेते हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी
कल्प
कहा गया है कि कल्प पहले से सोलहवें स्वर्ग में होते हैं। तो भवनत्रिक में ? वहाँ देवों में Categories तो होती हैं पर उन्हें
सम्यग्दर्शन
द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन अनंतानुबंधी की विसंयोजना तथा दर्शनमोहनीय के उपशम से होता है। जबकि प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन में विसंयोजना की जरूरत नहीं। मुनि श्री सौम्य सागर जी
पंचम गति
ऊपर की परम गति, संयम से सिद्ध( अवस्था)। नीचे की परम असंयम से निगोद।। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
अवगाहना/ आवली
अवगाहना घनफल रूप भी होती है(गाथा 96)। आवली को अवगाहना तथा भाव(गुणाकार रुप) में भी लिया है(गाथा 101)। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड –
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