Category: पहला कदम
एकल विहार
दो मुनि साथ रहकर भी सारी क्रियाएँ अलग-अलग कर रहे हों तो भी भगवान की आज्ञा (एकल विहार नहीं कर रहे) मानने से असंख्यात गुणी
अनुजीवी
“अनु” = अनुरूप/ उनमें हमारे प्राण। “जीवी” = जीवित रहने वाले/ जीवन, अस्तित्व इन्हीं से चलता है। प्रतिजीवी शरीर के। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ
आहार का परिणमन
7 धातुओं में आहार का परिणमन भोजन से नहीं, जठराग्नि से होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8)
सूतक / तीर्थयात्रा
सूतक में शिखर जी आदि की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि वहाँ पदचिन्ह हैं, मूर्तियों को छूना/ उनकी पूजा नहीं है। गुल्लक में दान
पंचशील
बौद्ध मत का पाँचवाँ शील बताया है…. मद्यपान-विरति, जैन दर्शन में पाँचवाँ……………………………… अपरिग्रह। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
जैनदर्शन
जैनदर्शन न द्वैतवादी है, ना ही अद्वैतवादी है। द्वैतवादी संश्लेष तथा संयोग संबंधों को मानते हैं, अद्वैतवादी दोनों को नहीं। जैनदर्शन तो इन दोनों संबंधों
तीर्थंकरों की महिमा
तीर्थंकरों की महिमा…. श्री सोनागिर सिद्धक्षेत्र से मुनि नंगकुमार, अनंगकुमार जी मोक्ष गए। चन्द्रप्रभु भगवान का समवसरण आया। मूलनायक प्रतिमा चन्द्रप्रभु भगवान की ही है।
मीमांसा
दर्शन तीन प्रकार के – तत्त्व मीमांसा –> सृष्टि का निर्माण कैसे आदि। ज्ञान मीमांसा –> ज्ञान की सीमाएँ क्या हैं। आचार मीमांसा –> ये
समय
स्टेज पर दूसरे कार्यक्रमों की बहुलता तथा धर्मचर्चा के लिए समय बहुत कम रह जाने पर, आचार्य श्री विद्यासागर जी –> समय की कीमत करो,
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