Category: पहला कदम

ज्ञान

सामान्यजन का ज्ञान प्राय: धारावाहिक/ पुनरावृत्ति वाला होता है। यही सही है (चाहे झूठ ही क्यों न हो) मिथ्याज्ञान है, क्योंकि संयोगपने से पैदा होता

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चेतना

कर्म-फल चेतना का अनुभव… कि मैं हूँ। फल भोगना सुख-दु:ख की अनुभूति तो सब जीवों में होती है, कीड़ों में भी। कर्म-चेतना (कर्ता भाव) संज्ञियों

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धर्मात्मा

धर्म शुरु में काँटों* से बचने को कहता है। आगे चलकर फूलों** से भी। चिंतन *अशुभ से। **शुभ/ सुख-सुविधा।

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आहार

1991 के मुक्तागिरी के चातुर्मास में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने मुनियों को सम्बोधन दिया… दुर्भाग्य है कि पंचमकाल में आहार के लिए रोज़ उठना

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ज्ञान

कम से कम ज्ञान निगोदिया को। जिसे “नित्य उद्घाटित ज्ञान” कहते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8)

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ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य व्रत … आलम्बन सहित। ब्रह्मचर्य धर्म … आलम्बन रहित। (नीलेश भैया – सांगानेर)</span

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जैन धर्म

जैन धर्म महान क्यों ? जैन धर्म ने भगवान बनाये। अन्य मतों में भगवान, धर्म बनाते हैं। आर्यिका सुयोग्यनंदनी माताजी

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अध्यात्म

अध्यात्म… संकल्प… मैं शरीर हूँ। विकल्प… शरीर के सुख-दु:ख से सुखी-दुखी। इन संकल्प/ विकल्प से दूर होना अध्यात्म। भेद-विज्ञान जानना, मानना तथा अनुभव में लाना।

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असंयम

जितना राग, उतना द्वेष। इंद्रिय असंयम से ही प्राणी असंयम जैसे द्विदल से। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/01)

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दिगम्बरत्व

वैदिक दर्शन में गांधारी ने दुर्योधन के शरीर को वज्र जैसा बनाने के लिये उसे दिगम्बरत्व धारण करने को कहा। अपूर्णता के कारण पूरा शरीर

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मंगल आशीष

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