छाया और अंधकार में फ़र्क़ क्या है ?
अंधकार… प्रकाश का अभाव।
छाया….. प्रकाश की अवरोधित अवस्था।

चिंतन

विहार चल रहा था। मुनि श्री संभवसागर जी 5:50 पर निकले। आचार्य श्री विद्यासागर जी 6:00 बजे।
बहुत देर तक आचार्य श्री पीछे-पीछे चलते रहे।
मिलने पर कहा… “बहुत देर से मैं तुम्हारे शरीर का X-Ray कर रहा था”
बहुत दिनों का साइटिका का दर्द ठीक हो गया। 12 साल से फिर कभी नहीं हुआ।

निर्यापक मुनि श्री संभवसागर जी

आँख वस्तु को बिना छुए ज्ञान प्राप्त करती है। ज्ञानी भी जानता/ देखता है, चीज़ों में involve नहीं होता।
वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ जवाब दे देती हैं। बस आँख की तरह दूर से समझो/ अंदर में रहो। सुखी रहोगे, क्योंकि सुख तो अंदर ही है।

आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी

स्त्री…
संयम + त्रि (धर्म, अर्थ, काम)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नारी तो नारायण की जननी है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

हराने से बेहतर है, जीत लिया जाए।
राम रावण को हरा नहीं सकते थे, बुराई में, सो जीत गए अच्छाई में।
कई बार हार कर भी जीता जा सकता है। (इसीलिए राम ने रावण को संदेश भेजा कि सीता को लौटा दो, मैं बिना बदला लिए वापस चला जाऊँगा।)

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

वृद्धावस्था के लाभ…
सर्दी लगी/ छींक आयी, डबल कपड़े पहन लिए (युवाओं की तरह लापरवाही नहीं) समस्या समाप्त।
गलती हुई, प्रायश्चित/ क्षमा माँगली, स्थिति सामान्य।

चिंतन

3 प्रकार के सिद्धांत –

  1. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब…..
  2. आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों…..
  3. आज का काम आज करो, कल का कल करना।
    पर करो आकुलता रहित/पूरी तन्मयता से।
    ये धर्म का सिद्धांत है।

चिंतन

आज सब अपनों में संलग्न, अपनों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं।
अपने को/ अपने लिए कुछ नहीं।
माँ बच्चों की प्रसन्नता में ही प्रसन्न। पति पत्नी को, पत्नी पति के लिए जीवन अर्पण। जबकि कोई भी “पर” को प्रसन्न कर ही नहीं सकता। यदि पति पत्नी खुद को प्रसन्न कर लें तो दोनों प्रसन्न हो सकते हैं।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

आत्मा गुब्बारे जैसी है… जन्म के समय बिंदु के आकार की। कर्मों के अनुसार आकार बढ़ता तथा Shape लेता जाता है। जैसे गुब्बारे में हवा भरती जाती है, किसी की Shape आदमी की किसी की जानवर की।

चिंतन

भावना… मन में उस भाव को बार-बार लाना ताकि मन उस भाव के लिए तैयार/ संस्कारित हो जाए। जैसे 16 प्रहरी पीपल बहुत असरदार होती है। पाँच-पाँच भावनाएँ महाव्रतियों के लिए पर देशव्रती भी भाएँगे।
भावना मन से भाई जाती है, व्रत/ संकल्प बुद्धि से लिए जाते हैं। व्रत प्रारंभिक साधना है। मन तथा बुद्धि को एक करना ही साधना है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/3)

दुखियों के प्रति कारुण्य भाव रखना/ हृदय द्रवित होना अच्छा है, पर दु:खी नहीं होना (दूसरों के दु:ख को अपने ऊपर ओढ़ना नहीं)।
कारण/ फायदा ?
सुख के समय फूलेंगे नहीं/ मन Balanced रहेगा।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/11)

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